वैद्युतिकी

वैद्युतिकी

भौतिकी विज्ञान की वह शाखा, जिसमें पदार्थों के वैद्युतिकी गुणों के अध्ययन किए जाते हैं, वैद्युतिकी कहते हैं।

विद्युत आवेश

आवेश पदार्थ का यह गुण है, जिसके कारण यह विद्युत एवं चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न करता है या इनका अनुभव करता है। आवेश अदिश राशि है तथा इसका SI मात्रक कुलॉम है। आवेश दो प्रकार के होते हैं: धनावेश एवं ऋणावेश।

आवेश के गुण

1. आवेश दो प्रकार के होते हैं धनावेश एवं ऋणावेश।

2. सजातीय आवेशों में प्रतिकर्षण तथा विजातीय आवेशों में सदैव आकर्षण होता है।

3) असमान आवेशों में आकर्षण (Attraction) होता है।

(4) आवेश का न्यूनतम मान (इलेक्ट्रॉन का आवेश) :1.6x 10^-19

5 . Q=i/t. Ya t= q/i. Ya. i= q/t

उदाहरणप्रश्न :यदि किसी चालक में 15 A धारा प्रवाहित हो रही है तथा आवेश 8 C है, तो समय ज्ञात कीजिए।

solution- t= q/i = 8/15 = 0.5 sec

विद्युत क्षेत्र

किसी विद्युत आवेश के चारों ओर का यह क्षेत्र जिसमें स्थित कोई अन्य आवेश आकर्षण अथवा प्रतिकर्षण बल का अनुभव करता है, विद्युत क्षेत्र कहलाता है।यह सदिश राशि है।★ **

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता

विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु पर स्थित एकांक धनावेश जितने आकर्षण एवं प्रतिकर्षण बल का अनुभव करता है, उसे उस बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की तीव्रता कहते हैं। यह एक सदिश राशि है तथा इसका SI मात्रक न्यूटन/कुलॉम होता है। इसे E से प्रदर्शित किया जाता है।

अर्थात E = F/q

यही कारण है कि कार से यात्रा करते समय यदि तेज वर्षा होने लगे और बिजली गिरने की संभावना हो, तो सुरक्षा का उपाय यही है कि कार की खिड़कियां पूर्णतः बंद करके अंदर ही बैठकर रहा जाए। यदि बिजली कार पर भी गिरती है, तो कोई भी हानि नही होगी, क्योंकि विद्युत आवेश कार की सतह पर ही रहेगा।

विद्युत विभव

एकांक स्वतंत्र धनावेश को अनन्त से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में जितना कार्य करना होता है, उसे उस बिन्दु का विद्युत विभव कहते हैं। विभव एक अदिश राशि है इसका SI मात्रक वोल्ट है।

जिसको हम E_p = Electric potential भी लिखते हैं।Ep = W/Q

विभव संपर्क में रखे चालकों में आवेश के प्रवाह होने की दिशा निर्धारित करता है क्योंकि आवेश हमेशा उच्च विभव से निम्न विभव की ओर प्रवाहित होता है। पृथ्वी का विभव शुन्य तथा इसकी धारिता अनन्त मानी जाती है।

विभवान्तर

विद्युत क्षेत्र में स्थित किन्ही दो बिन्दुओं के विभव के मध्य के अन्तर को विभवान्तर कहा जाता है। यह एक अदिश राशि है। विभवान्तर का SI मात्रक वोल्ट (V) है। V= V2-V1

विद्युत धारा

किसी चालक के किसी परिच्छेद से आवेश प्रवाह की दर को विद्युत धारा कहते हैं। विद्युत धारा में परिणाम तथा दिशा दोनों होती है फिर भी यह एक अदिश राशि है। यह एक मुल राशि है, जिसका SI मात्रक एम्पीयर तथा संकेत A है।

i = q/t

विद्युत धारा के प्रकार

2 प्रकार होते हैं

दिष्ट धारा

किसी परिपथ में धारा समय के साथ एक दिशा में चाले में चाले, उसे दिष्ट धारा कहते हैं।

प्रत्यावर्ती धारा

जब किसी परिपथ में धारा समय के साथ बदलती है, प्रत्यावर्ती धारा कहलाता है।

विद्युत चालक

वे पदार्थ जिनमें विद्युत धारा का प्रवाह आसानी से हो जाता है, सुचालक / विद्युत चालक कहलाता है। चालकों में मुक्त इलेक्ट्रॉन की संख्या अधिक होती है।

उदाहरण -चांदी, तांबा, एल्युमिनियम आदि>

विद्युत रोधी

कुचालक पदार्थ

ऐसे पदार्थ जिनमें से ऊष्मा आसानी से नही गुजरती, उन्हें कुचालक पदार्थ कहते हैं, जैसे लकड़ी, रबड़ आदि

अर्धचालक

उन पदार्थों को कहते हैं जिनकी विद्युत चालकता चालकों (जैसे तांबा) से कम किन्तु अचालकों (जैसे काच) से अधिक होती है।

उदाहरण- सिलिकॉन, जर्मेनियम, कैडमियम सल्फाइड, गैलियम आर्सेनाइड आदि अर्धचालकों का कुछ उदाहरण हैं।

ओम का नियम

सर्वप्रथम जर्मनी के भौतिक…. किसी चालक में बहने वाली धारा और विभवान्तर में सम्बन्ध बताने के लिए एक नियम प्रतिपादित किया जिसे ओम का नियम कहते हैं।

प्रतिरोध

जब कोई धारा के मार्ग में रुकावट उत्पन्न होती है तब उसको प्रतिरोध कहते हैं। प्रतिरोध कई चीजों पर निर्भर करता है जैसे – ताप, मोटाई, पतला, लम्बाई, मौसम आदि।

प्रतिरोध का संयोजन

श्रेणी क्रम

इसमें धारा (I) समान, वोल्टेज असमान तथा प्रतिरोध असमान होता है। R= R1+R2+R3

समान्तर संयोजन

इसमें धारा-असमान, वोल्टेज-समान तथा प्रतिरोध असमान होता है। 1/R = 1/R+1/R….

विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव

किसी चालक तार में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर चालक तार के गर्म होकर ऊष्मा देने की परिघटना विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहलाती है।

विद्युतीय धारा की ऊष्मीय प्रभाव का उपयोग

– विद्युत प्रेस, विद्युत हिटर, घरेलू उपकरण, विद्युत बल्ब में प्रकाश करने, घरों में उपयोग होने वाली फ्यूज तार आदि में किया जाता है। जो कि तापमान धारा प्रवाह से वृद्धि हो तो ऊष्मीय मान में भी वृद्धि होती है।

प्राथमिक सेल

वे सेल जिसमें रासायनिक अभिक्रियाएं अनुक्रमणीय होती हैं, अर्थात् इन सेलों को एक बार उपयोग करने के बाद इन्हें पुनः आवेशित नही किया जा सकता है, जैसे शुष्क सेल, लेक्लांची सेल, वोल्टीय सेल आदि।

द्वितीयक सेल

ये सेल जिनमें रासायनिक अभिक्रियाएं उत्क्रमणीय होती हैं, अर्थात् इन सेलों को बार बार उपयोग में लाने के बाद पुनः आवेशित किया जा सकता है।

जैसे शीशा संचायक सेल, नी-फे सेल।

अमीटर

अमीटर एक ऐसा उपकरण है जिसकी सहायता से परिपथ में बहने वाली धारा की माप की जाती है। अमीटर को किसी विद्युत परिपथ में सदैव श्रेणी क्रम में जोड़ा जाता है ताकि मापी जानी वाली संपूर्ण धारा अमीटर से ही प्रवाहित हो। आदर्श अमीटर का प्रतिरोध शून्य होना चाहिए।

विद्युत अध्याय ऑनलाइन टेस्ट

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कुल प्रश्न: 20

प्रति प्रश्न समय: 40 सेकंड


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