रेडियोऐक्टिवता (Radioactivity)

रेडियोधर्मिता की मूल अवधारणा

रेडियोधर्मिता अस्थिर परमाणु नाभिकों द्वारा स्वतः स्फूर्त रूप से ऊर्जावान कणों (अल्फा, बीटा) या विद्युत चुंबकीय तरंगों (गामा किरणों) को उत्सर्जित करके अधिक स्थिर होने की प्रक्रिया है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन इसे कृत्रिम रूप से भी उत्पन्न किया जा सकता है। इसके प्रमुख स्रोत यूरेनियम और रेडियम जैसे अस्थिर तत्व हैं।

प्रकार (किरणें)

इसमें मुख्य रूप से तीन प्रकार के विकिरण हैं: अल्फा, बीटा, और गामा किरणें

अर्ध-आयु

यह वह समय है जिसमें किसी रेडियोधर्मी पदार्थ के आधे परमाणु विघटित हो जाते हैं।

खतरे

रेडियोधर्मी विकिरण कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियां उत्पन्न कर सकती हैं।

उपयोग

चिकित्सा (कैंसर उपचार), ऊर्जा उत्पादन (परमाणु रिएक्टर) और पुरातात्विक वस्तुओं की उम्र (रेडियोमेट्रिक डेटिंग)

इकाईयां

रेडियोधर्मिता को मापने के लिए बैकेरेल Bq और क्युरी Ci का उपयोग किया जाता है, जबकि मानव शरीर पर प्रभाव को सीवर्ट Sv से मापा जाता है।

इतिहास

इसकी खोज सबसे पहले 1896 में हेनरी बैकेरेल ने की थी, जिसके बाद मैरी और पियरे क्युरी ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया।

रेडियोधर्मिता और नाभिकीय रसायन विज्ञान

उन्नीसवीं शताब्दी में परमाणु सिद्धांत यह मानता था कि नाभिकों की संरचना स्थिर होती है। लेकिन 1896 में, फ्रांसीसी वैज्ञानिक हेनरी बैकेरेल ने पाया की एक फोटोग्राफिक प्लेट के पास रखा यूरेनियम यौगिक प्लेट पर छवि बनाता है, भले ही यौगिक को काले कपड़े में लपेटा गया हो।

उन्होंने तर्क दिया कि यूरेनियम यौगिक किसी प्रकार का विकिरण उत्सर्जित कर रहा था जो कपड़े से होकर फोटोग्राफिक प्लेट को उजागर कर रहा था। आगे की जांच से पता चला कि विकिरण कणों और विद्युत चुंबकीय किरणों का संयोजन था, जिसका अंतिम स्त्रोत परमाणु नाभिक था। इन उत्सर्जनों को सामूहिक रूपों से रेडियोधर्मिता कहा जाने लगा।

बेरेल द्वारा रेडियोधर्मिता की आकस्मिक खोज के बाद, कई प्रमुख वैज्ञानिकों ने इस पर नए और दिलचस्प घटनाक्रम की जांच शुरू की। इनमें मैरी क्युरी (नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला और रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान में दो नोबेल जीतने वाली एकमात्र व्यक्ति) शामिल थी, जिन्होंने सबसे पहले “रेडियोधर्मिता” शब्द का प्रयोग किया, और अर्नेस्ट रदरफोर्ड (स्वर्ण पन्नी प्रयोग के लिए प्रसिद्ध), जिन्होंने विकिरण के तीन सबसे सामान्य प्रकारों की जांच की और उनका नामकरण किया।

एक अस्थिर न्यूक्लाइड का स्वतः किसी अन्य अस्थिर न्यूक्लाइड में परिवर्तित होना रेडियोधर्मी क्षय कहलाता है। अस्थिर न्यूक्लाइड को जनक न्यूक्लाइड कहते हैं। क्षय से बनने वाले न्यूक्लाइड को पुत्री न्यूक्लाइड कहते हैं। पुत्री न्यूक्लाइड स्थिर हो सकती है, या स्वयं भी क्षय हो सकती है। रेडियोधर्मी क्षय के दौरान उत्पन्न विकिरण इस प्रकार होता है कि पुत्री न्यूक्लाइड, जनक न्यूक्लाइड की तुलना में स्थिरता क्षेत्र के अधिक निकट होती है, इसलिए स्थिरता क्षेत्र के सापेक्ष किसी न्यूक्लाइड की स्थिति से उसके क्षय के प्रकार का अनुमान लगाया जा सकता है।

रेडियोधर्मिता के प्रमुख रूप

अल्फा कण

रदरफोर्ड के प्रयोगों ने यह प्रदर्शित किया कि रेडियोधर्मी उत्सर्जन के तीन मुख्य रूप होते हैं। पहला रूप अल्फा कण कहलाता है, जिसे ग्रीक अक्षर alpha से दर्शाया जाता है। अल्फा कण दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन से मिलकर बना होता है और यह हीलियम नाभिक के समान होता है। इस पर 2+ आवेश होता है जिसके कारण अक्सर हम इसको दर्शाने के लिए 2^4He का उपयोग करते हैं।जब कोई रेडियोधर्मी परमाणु अल्फा कण उत्सर्जित करता है, तो मूल परमाणु की परमाणु संख्या दो कम हो जाती है (दो प्रोटॉन के नुकसान के कारण) और उसका द्रव्यमान चार कम हो जाता है (चार नाभिकीय कणों के नुकसान के कारण)। हम अल्फा कण के उत्सर्जन को एक रासायनिक समीकरण द्वारा दर्शा सकते हैं। उदाहरण – U-235

बीटा कण

दूसरे प्रकार के रेडियोधर्मी उत्सर्जन को बीटा कण कहा जाता है, जिसे ग्रीक अक्षर beta से दर्शाया जाता है। बीटा कण नाभिक से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन होता है (नाभिक के चारों ओर स्थित इलेक्ट्रॉन कोशों से नहीं) और इस पर -1 आवेश होता है। हम बीटा कण को -1^0 e के रूप में भी दर्शा सकते हैं।

बीटा कण उत्सर्जन नाभिक पर कुल प्रभाव यह होता है कि एक न्यूट्रॉन एक प्रोटॉन में परिवर्तित हो जाता है। कुल द्रव्यमान संख्या वही रहती है, लेकिन प्रोटॉन की संख्या एक बढ़ने के कारण परमाणु संख्या एक बढ़ जाती है। कार्बन-14 बीटा कण उत्सर्जित करके क्षय होता है।

गामा विकिरण

रेडियोधर्मी उत्सर्जन का तीसरा प्रमुख प्रकार कण नहीं बल्कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण का एक अत्यंत उर्जावान रूप है जिसे गामा किरणें कहा जाता है, जिसे ग्रीक अक्षर gamma से दर्शाया जाता है। विद्युत चुम्बकीय विकिरण को तरंगदैर्ध्य और फोटॉन उर्जा के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

नाभिकीय विखंडन

कभी कभी एक परमाणु नाभिक रेडियोधर्मी प्रक्रिया द्वारा छोटे छोटे टुकड़ों में टुट जाता है जिसे स्वतः विखंडन कहते है। अक्सर विखंडन से अतिरिक्त न्यूट्रॉन उत्पन्न होते है जिन्हें कभी कभी अन्य नाभिक ग्रहण कर लेते है, जिससे संभामतः अतिरिक्त रेडियोधर्मी घटनाएं उत्पन्न हो सकती है। U-235 में थोड़ी मात्रा में स्वतः विखंडन होता है। एक विशिष्ट अभिक्रिया इस प्रकार है— U-235—> p+, e- , n0

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